Gorakhpur AIIMS News: निदेशक डॉ. विभा दत्ता को जांच के लिए जाना पड़ा निजी अस्पताल, कैथ लैब की कमी पर उठे सवाल
गोरखपुर एम्स की कार्यकारी निदेशक की अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें निजी अस्पताल ले जाना पड़ा। एम्स में कैथ लैब की सुविधा अभी शुरू नहीं हुई है। हालांकि, निदेशक ने स्पष्ट किया कि उनकी जांच सामान्य थी और निजी अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं पड़ी।
गोरखपुर | 1 नवंबर 2026 | दैनिक गोरखपुर
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की चिकित्सा सुविधाएं एक बार फिर चर्चा में हैं। संस्थान की कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) डॉ. विभा दत्ता की 28 अक्टूबर को अचानक तबीयत बिगड़ गई। उन्हें पहले एम्स के इमरजेंसी विभाग में उपचार दिया गया, लेकिन हृदय संबंधी गंभीर समस्या की आशंका के चलते आगे की जांच के लिए एक निजी अस्पताल ले जाना पड़ा।
इस घटना ने पूर्वांचल के प्रमुख सरकारी चिकित्सा संस्थान में अत्याधुनिक हृदय उपचार सुविधाओं की उपलब्धता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अचानक बिगड़ी तबीयत, एम्स में मिला प्राथमिक उपचार
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, डॉ. विभा दत्ता को अपने आवास पर अचानक चक्कर आया और वह कुछ समय के लिए बेहोश हो गईं। जानकारी मिलते ही चिकित्सकीय टीम सक्रिय हुई और उन्हें एम्स गोरखपुर के इमरजेंसी विभाग में पहुंचाया गया।
वहां डॉक्टरों ने उनकी प्रारंभिक जांच और उपचार किया। इसके बाद उनकी स्थिति स्थिर हो गई। हालांकि, चिकित्सकों को आशंका थी कि हृदय से संबंधित किसी समस्या के लिए अतिरिक्त जांच या पेसमेकर जैसी प्रक्रिया की आवश्यकता पड़ सकती है।
एम्स में कैथ लैब चालू नहीं होने के कारण एहतियातन उन्हें ऐसी सुविधा वाले एक निजी अस्पताल में ले जाया गया।
निजी अस्पताल जाने पर डॉ. विभा दत्ता ने क्या कहा?
घटना की जानकारी सार्वजनिक होने के बाद कई खबरों में दावा किया गया कि एम्स की निदेशक को अपने ही संस्थान में पर्याप्त इलाज नहीं मिल सका।
हालांकि, डॉ. विभा दत्ता ने मीडिया से बातचीत में स्थिति स्पष्ट की। उनके अनुसार, एम्स में शुरुआती उपचार और आवश्यक जांच की गई थीं। डॉक्टरों ने संभावित हृदय समस्या को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त सावधानी बरती और निजी अस्पताल ले जाने का निर्णय लिया।
उन्होंने बताया कि निजी अस्पताल के चिकित्सकों ने उनकी रिपोर्ट देखीं, जो सामान्य थीं। वहां उन्हें भर्ती करने या कोई अतिरिक्त उपचार देने की आवश्यकता नहीं पड़ी। निजी अस्पताल में करीब आधे घंटे की जांच और चिकित्सकीय सलाह के बाद वह लौट आईं।
अगले दिन से उन्होंने अपना कार्यालय का कामकाज भी शुरू कर दिया।
सात साल बाद भी एम्स में कैथ लैब चालू क्यों नहीं?
इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल एम्स गोरखपुर में कैथ लैब की उपलब्धता को लेकर उठ रहा है।
गोरखपुर एम्स में वर्ष 2019 से ओपीडी सेवाएं संचालित हो रही हैं, जबकि दिसंबर 2021 में संस्थान का औपचारिक उद्घाटन हुआ था। इसके बावजूद अक्टूबर 2026 तक कैथ लैब की सुविधा शुरू नहीं हो सकी है।
कैथ लैब यानी कैथेटराइजेशन लैबोरेटरी एक विशेष चिकित्सा सुविधा है, जहां हृदय की धमनियों की जांच और एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्टी जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं की जा सकती हैं।
इन सुविधाओं का समय पर उपलब्ध होना कुछ गंभीर हृदय रोगियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
कैथ लैब का 70 प्रतिशत काम पूरा, दिसंबर तक शुरू होने की उम्मीद
30 अक्टूबर को सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, एम्स प्रशासन ने बताया कि कैथ लैब स्थापित करने से संबंधित लगभग 70 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है।
संस्थान के अधिकारियों के मुताबिक, आवश्यक उपकरण और अत्याधुनिक मशीनों की व्यवस्था की जा रही है। डॉ. विभा दत्ता के अनुसार, इसके लिए लगभग 14 से 15 करोड़ रुपये के विशेष बजट को मंजूरी मिली है।
कैथ लैब को दिसंबर 2026 तक चालू करने का लक्ष्य बताया गया है। हालांकि, यह फिलहाल संभावित समयसीमा है, इसकी शुरुआत की निश्चित तारीख घोषित नहीं हुई है।
पूर्वांचल और बिहार के मरीजों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह सुविधा?
गोरखपुर एम्स केवल स्थानीय मरीजों के लिए ही नहीं, बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के सीमावर्ती क्षेत्रों से आने वाले मरीजों के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संस्थान है।
महराजगंज, कुशीनगर, देवरिया, बस्ती, संतकबीरनगर और आसपास के जिलों के अनेक मरीज बेहतर इलाज की उम्मीद में गोरखपुर पहुंचते हैं।
कैथ लैब शुरू होने के बाद संस्थान में हृदय रोगों की उन्नत जांच और कुछ आवश्यक चिकित्सकीय प्रक्रियाओं की सुविधा बढ़ सकेगी। इससे मरीजों को ऐसी सेवाओं के लिए अन्य अस्पतालों पर निर्भर रहने की जरूरत कम हो सकती है।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठते सवाल
डॉ. विभा दत्ता की घटना के दो पहलू सामने आए हैं। पहला, एम्स के चिकित्सकों ने तत्काल उपचार किया और अतिरिक्त जांच की आवश्यकता को देखते हुए सावधानीपूर्वक दूसरे अस्पताल भेजने का निर्णय लिया।
दूसरा, इतने बड़े केंद्रीय चिकित्सा संस्थान में कैथ लैब जैसी महत्वपूर्ण सुविधा अभी तक शुरू नहीं हो पाना स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की रफ्तार पर सवाल खड़ा करता है।
यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि किसी भी बड़े अस्पताल की गुणवत्ता केवल उसकी इमारत या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि समय पर उपलब्ध जांच, उपकरण, विशेषज्ञों और आपातकालीन सेवाओं से भी तय होती है।
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि दिसंबर 2026 तक कैथ लैब शुरू करने का लक्ष्य पूरा होगा या नहीं। पूर्वांचल के हृदय रोगियों के लिए इस सुविधा का वास्तविक संचालन शुरू होना महत्वपूर्ण होगा।
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