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पूर्वांचल के लोकगीत ‘कजरी व बिरहा’ को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल करने का प्रस्ताव तैयार

✍️ राकेश मणि शुक्ला 📅 प्रकाशित: 1/9/2026
पूर्वांचल के लोकगीत ‘कजरी व बिरहा’ को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल करने का प्रस्ताव तैयार

माटी की सौंधी खुशबू बिखेरते पूर्वांचल के लोकगीतों को मिलेगा वैश्विक सम्मान। वरिष्ठ लोक गायकों की आवाज और दुर्लभ बंदिशों की हाई-क्वालिटी डिजिटल रिकॉर्डिंग।

पूर्वांचल के लोकजीवन की आत्मा कहे जाने वाले पारंपरिक लोकगीत 'कजरी' और 'बिरहा' को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित करने के लिए भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और संगीत नाटक अकादमी ने एक व्यापक डॉजियर तैयार कर यूनेस्को (UNESCO) को भेजने की प्रक्रिया पूरी कर ली है। **सावन के झूले और वीर रस की अनूठी परंपरा:** कजरी जहां सावन के महीने में विरह, प्रकृति प्रेम और श्रृंगार रस की अनमोल अभिव्यक्ति है, वहीं बिरहा पूर्वांचल के ग्रामीण समाज में वीरता, त्याग और ऐतिहासिक गाथाओं को सुनाने की जीवंत वाचिक परंपरा है। **ग्राम स्तर पर लोक कलाकारों का डेटाबेस:** प्रस्ताव के तहत मिर्जापुर, वाराणसी, गोरखपुर, देवरिया और आजमगढ़ के 2000 से अधिक पारंपरिक अखाड़ों और बुजुर्ग गायकों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग राष्ट्रीय आर्काइव में सुरक्षित की जा रही है, ताकि यह अमूल्य धरोहर युगों-युगों तक अक्षुण्ण रहे।